अधंबिस्वास
बात तब की है जब मै 12वीं में पढता था। एक दिन सुबह रोज की तरह जब स्कूल पहुचा तो सुबह सुबह स्कूल के प्रांगण में कुछ छात्रों की भीड लगी हुइ थी। आपस में खुसुर फुसुर हो रही थी। मै जब भीड में सामिल हुआ तो मैने सुना की एक आदमी जिसका नाम लछु था। उसके सपने में रात को एक बाबा आये। और बाबा जी ने सपने में उसे एक पेड दिखाया और कहा कि इस पेड की पत्ती जिस किसी को अपने हाथों से देगा उसको जो भी बिमारी होगी वो ठीक हो जायेगी । इतना कहने के बाद बाबा जी बिलुप्त हो गये।
लक्षु अचानक नीद से उठकर बैठ गया। और सोचने लगा कि उसने एसा सपना क्या देखा होगा। उसने अपनी पत्नी को जगाया। और सारी कहानी पत्नी को बता दिया।
लछु गरीब था । दिन भर मजदूरी कर अपने परिवार का पेट पालता था। उसकी पत्नी बोली आप दिनभर काम करके थक जाते होंगे ईसीलिये ऎसे सपने आते है। वो बोला लेकिन आज तक क्यों नही आये। कुछ देर सोचने के बाद पत्नी बोली आप उस पेड को पहचान सकते हो क्या? वो बोला क्यों नही अगर वो पेड सामने हो तो में पहचान सकता हुं। दूसरे दिन लछु काम पर भी नही गया। सुबह होते ही वो दोनों उस पेड की तलाश में निकल गये। जंगल पहुंचते ही उनको वो पेड मिल गया। उनहोने उस पेड की काफी सारी पत्तियां तोड के ले आये और ये घटना उनहोंने गांव वालों को बता दी।
जब गांव वालों को इस बात का पता चला तो सब लोग उससे दवा लेने के लिये आने लगे। अब यह खबर एक गांव से दूसरे गांव में आग की तरह फैलने लगी। देखते ही देखते हर तरफ से लोग आने लगे उधर लछु की अछी खासी आमदनी होने लगी क्योंकी जो लोग दवा लेने आते वो 20रूपया उसके दरवार में चढाते।
इस खबर को जो भी सुनता वो भागा भागा वहां चला आता। यह खबर जब मैने सुना तो मे़ भी अपने आप को न रोक सका। क्योंकि मेरी माता जी हमेसा बिमार रहती है उन्हें हड्डीबुखार है। मैने सोचा अगर वो दवा मां को दी जाए तो सायद मां ठीक हो सकती है। इसीलिये स्कूल से छुट्टी होने के बाद मे़ जैसे ही घर पहुचा मैने यह खबर अपने मम्मी पापा को सुनाइ पहले तो घर वाले मानने को तैयार न थे। मगर मैने जैसे तैसे उनको मना ही लिया। यह खबर हमारे गांव में भी सबको पता था। हमने भी वहां जाने का प्रोग्राम बनाया। अगले दिन सुबह हम वहां के लिये निकल पडे। जब हम मेंन रोड पर पहुंचे जहां से हमे बस पकडनी थी वहां पर हम घण्टो खडे़ रहे कोइ बस या जीप एसी नही थी जिसमें एक भी सीट खाली हो। यहां तक की बस जीप के छतों में भी जगह नही थी। हम दस लोग थे। दो घण्टे इन्तजार के बाद एक बस आई वह भी खचाखच भरी हुई थी। खैर हमें छत मे़ बैठने के लिये जगह मिल गई। अब हम छत में बैठकर सफर का आनन्द लेते हुए जा रहे थे। सडकों पर गाडियो़ की आवा जाही काफी तेज थी। जिन सडकों पर पूरे दिन में चार पांच गाडियां चला करती थी उन पर अब सैकडों गाडियां चल रही है। हर तरफ का नजारा एकदम बदल सा गया है। बस से उतर के बाद हमें पहाडी के नीचे करीब 1 घण्टा पैदल जाना था। और वह रस्ता एकदम जीर्ण था अगर किसी का पैर फिसल गया तो वो पता नही कहां जा के रुकेगा। हम कूद्ते फांदते नदी के किनारे पर पहुचे वहां से करीब 15 मिनिट का रस्ता था जो सीधा लछु के घर पर पहुचता था। जैसे ही थोडा आगे की तरफ गये तो हमें एक लम्बी लाईन लगानी पडी वो लाईन दवाई के लिये लगाई गई थी। हम भी जब उसके घर के समीप पहुचे तो देखा कि कुछ लोग हाथ में डंडा लिये खडे थे। दरअसल वो लो लोग पहरेदार थे। उनका काम केवल इतना था कि भीड को काबू मे़ करना खेर जो भी हो। अब धीरे-धीरे हमारा भी नम्बर आया। मेंने भी 20 रू0 चढाकर एक पुडिया ली और वापस अपने साथियों का इन्तजार करने लगा। काफी देर के बाद मै और मेरे साथी एकत्र होने के बाद हमने प्लान बनाया की अब खना खा लिया जाय। मगर काफी दूर दूर तक कोई रेस्तरां नही था। हम लोग वापस बस स्टोप के लिये निकल गये। अब हमें वापस वो चढाई पार करनी थी। अमूमन क्या होता है हम जब कही पहली बार जाते हैं तो हमें रास्ते का इतना पता नही लगता है। और हम खुसी खुसी में रास्ता पार कर जाते है। अब हमें उस रास्ते की पहचान हो गयी थी। इसलिये उपर चढना काफी मुस्किल लग रहा था। और हमने खाना भी नही खाया था। उठते बैठते हम बस तक पहुचे और वापस घर के लिये रवाना हो गये। मैं रास्ते भर सोचता हुआ जा रहा था। कि इतने सारे लोग इतना भीड भडाका ....... शाम को घर पहुचने के बाद मैने दवा मां को खिलाई और अगले दिन रोज की तरह मै स्कूल गया। स्कूल हरएक की जुबान पर यही चर्चा थी। लोगों के मुह से सुनने में आया की किसी गांव में एक बुजुर्ग दमा रोग से पीडित था वह यह दवा खा के ठीक हो गया। मगर मैने एक बात नोट की कि सब लोग दूसरे गांव के बारे में बोल रहे हें मगर अपने गांव का हाल कोई नही बता रहा है। दुसरे दिन सुनने में आया कि वो दवा रोगी को तीन बार खिलानी पडती है तबभी जाके वो दवा असर करती है। मैने सोचा सायद मेरी मां को तभी आराम नही पहुच रहा। ये बात में अपने गांव वालो को बताता उन्हें इस बात की खबर पहले से थी। अगले दिन हम फिर दवा लेने पहुचे इस बार और ज्यादा भीड थी। अब हमारी बारी थी तीसरी आखंरी बार दवा लाने की। इस बार हम घर से ही खाना बना के ले गये थे। हम और दिन की तरह इस बार भी गाडी का इन्तजार कर रहे थे। इस बार हमें जीप मिली और हम लोग जीप में सफर कर रहे थे। हम अपने बस स्टेंड से करीब 1.2 की0मी0 दूर पहुचे ही होंगे कि हमारी जीप खराब हो गई वंहा से हमें पैदल का रास्ता तय करना था। क्योंकि उस आधे रास्ते से हमें कोई भी गाडी नही मिलने वाली थी।उस जीप मे हम लगभग 16लोग थे। हमने पैदल मार्च सुरु किया। दोपहर के 3 बजे लगभग उस गांव के समीप पहुचे इस बार वहां का नजारा देखने लायक था। वो जीर्ण रास्ता अब लोगों के चलने से अछा बन गया रास्तों के किनारों पर छोटी छोटी दुकाने खुल गयी। कहीं पर पूडी छोले तो कहीं पर फल वाला और कहीं पर छोटा सा ढाबा, अब वहां पर ये सुविधांये हो गयी। हम तो अपना खाना ले गये थे। अब हम दवा लेने के लोये नीचे की तरफ अतरने लगे। आसमान में बादल छाए हुये थे। बारिश कभी भी हो सकती थी ईसी वजह से सारे लोग तेजी से चले जा रहे थे। हम कुछ दूर नीचे की तरफ उतरे ही थे कि अचानक बारिश की बुंदे गिरने लगी। उतार वाले रास्ते में काफी मिट्टी होने की वजह से रास्ता काफी फिसलन सा हो गया था। खैर हम बचते बचाते आगे बढे। बारिश का मिजाज बढने लगा। लोगों की गति भी तेज होने लगी। हमारे आगे एक करीब 20 लोगों की टोली जा रही थी। अचानक एक महिला का पैर फिसल गया। उसके हाथ में एक थैला था। जिसमें एक अगरबत्ती का पाकेट और कुछ फूल थे। वो महिला जमीन से रघड खाती हुई इतनी दूर तक गयी की मानो वो फिसलपट्टी पर बैठी हो़। फिसलन काफी बढ गई थी। हम भी सोचसमझकर ही कदम रख रहे थे। इस बार लाईन पहले से और बडी थी। अब हम भी लाईन में लग चुके थे। उस घर के अगल बगल जो भी खेत थे उनमें घास का एक तिनका तक न था। इतने लोगों चलने से घास और बोई हुई फसल सब नस्ट हो गई थी। मैं जब उस घर के समीप पहुंचा तो भीड में हल्का सा धक्का लगा। मेरे हाथ में जो रोटी का थैला था वो जमीन में गिर गया। वो थैला लोगों के पैरों के तले कुचलने लगा। काफी मसक्कत के बाद उस थैले को उठा पाया। दवा लेने के बाद जब हम एकत्र हुये। तो हमने खाना खाने का फैसला किया हम एक बडे पत्थर पर बैठ गये। सबने अपना-अपना खाना निकाला मैने भी निकाला। अपनी रोटी सब्जी को देखदर में दंग रह गया। रोटी-सब्जी का हाल कुछ इस तरह था। सब्जी- आलू कि सब्जी को देखकर एसा लग रहा था कि जैसे किसी मशाले का पेस्ट बनाया होगा। और् रोटी-रोटी को देखकर एसा लग रहा था। जैसे गूंदा हुआ आटा रखा होगा। खैर मैने साथियों के साथ मिलकर उनका खाना खाया। और घर के लिये रवाना हो गये। घर पहुचने के बाद वो दवा मां को खिला दी। मैं आज तक इन्तजार करता रहा। मगर उस दवा से कोइ फायदा नही हुआ। हमने बेकार में समय बरबाद किया। इसीलिये कहते हैं कि अधंविस्वास में नही रहना चाहिये। जहां तक मैने सर्वे किया उस दवा से कोइ भी ठीक नही हूआ। ईसीलिये किसी ने ठीक ही कहा है कि "सोचो समझो फिर करो"
लक्षु अचानक नीद से उठकर बैठ गया। और सोचने लगा कि उसने एसा सपना क्या देखा होगा। उसने अपनी पत्नी को जगाया। और सारी कहानी पत्नी को बता दिया।
लछु गरीब था । दिन भर मजदूरी कर अपने परिवार का पेट पालता था। उसकी पत्नी बोली आप दिनभर काम करके थक जाते होंगे ईसीलिये ऎसे सपने आते है। वो बोला लेकिन आज तक क्यों नही आये। कुछ देर सोचने के बाद पत्नी बोली आप उस पेड को पहचान सकते हो क्या? वो बोला क्यों नही अगर वो पेड सामने हो तो में पहचान सकता हुं। दूसरे दिन लछु काम पर भी नही गया। सुबह होते ही वो दोनों उस पेड की तलाश में निकल गये। जंगल पहुंचते ही उनको वो पेड मिल गया। उनहोने उस पेड की काफी सारी पत्तियां तोड के ले आये और ये घटना उनहोंने गांव वालों को बता दी।
जब गांव वालों को इस बात का पता चला तो सब लोग उससे दवा लेने के लिये आने लगे। अब यह खबर एक गांव से दूसरे गांव में आग की तरह फैलने लगी। देखते ही देखते हर तरफ से लोग आने लगे उधर लछु की अछी खासी आमदनी होने लगी क्योंकी जो लोग दवा लेने आते वो 20रूपया उसके दरवार में चढाते।
इस खबर को जो भी सुनता वो भागा भागा वहां चला आता। यह खबर जब मैने सुना तो मे़ भी अपने आप को न रोक सका। क्योंकि मेरी माता जी हमेसा बिमार रहती है उन्हें हड्डीबुखार है। मैने सोचा अगर वो दवा मां को दी जाए तो सायद मां ठीक हो सकती है। इसीलिये स्कूल से छुट्टी होने के बाद मे़ जैसे ही घर पहुचा मैने यह खबर अपने मम्मी पापा को सुनाइ पहले तो घर वाले मानने को तैयार न थे। मगर मैने जैसे तैसे उनको मना ही लिया। यह खबर हमारे गांव में भी सबको पता था। हमने भी वहां जाने का प्रोग्राम बनाया। अगले दिन सुबह हम वहां के लिये निकल पडे। जब हम मेंन रोड पर पहुंचे जहां से हमे बस पकडनी थी वहां पर हम घण्टो खडे़ रहे कोइ बस या जीप एसी नही थी जिसमें एक भी सीट खाली हो। यहां तक की बस जीप के छतों में भी जगह नही थी। हम दस लोग थे। दो घण्टे इन्तजार के बाद एक बस आई वह भी खचाखच भरी हुई थी। खैर हमें छत मे़ बैठने के लिये जगह मिल गई। अब हम छत में बैठकर सफर का आनन्द लेते हुए जा रहे थे। सडकों पर गाडियो़ की आवा जाही काफी तेज थी। जिन सडकों पर पूरे दिन में चार पांच गाडियां चला करती थी उन पर अब सैकडों गाडियां चल रही है। हर तरफ का नजारा एकदम बदल सा गया है। बस से उतर के बाद हमें पहाडी के नीचे करीब 1 घण्टा पैदल जाना था। और वह रस्ता एकदम जीर्ण था अगर किसी का पैर फिसल गया तो वो पता नही कहां जा के रुकेगा। हम कूद्ते फांदते नदी के किनारे पर पहुचे वहां से करीब 15 मिनिट का रस्ता था जो सीधा लछु के घर पर पहुचता था। जैसे ही थोडा आगे की तरफ गये तो हमें एक लम्बी लाईन लगानी पडी वो लाईन दवाई के लिये लगाई गई थी। हम भी जब उसके घर के समीप पहुचे तो देखा कि कुछ लोग हाथ में डंडा लिये खडे थे। दरअसल वो लो लोग पहरेदार थे। उनका काम केवल इतना था कि भीड को काबू मे़ करना खेर जो भी हो। अब धीरे-धीरे हमारा भी नम्बर आया। मेंने भी 20 रू0 चढाकर एक पुडिया ली और वापस अपने साथियों का इन्तजार करने लगा। काफी देर के बाद मै और मेरे साथी एकत्र होने के बाद हमने प्लान बनाया की अब खना खा लिया जाय। मगर काफी दूर दूर तक कोई रेस्तरां नही था। हम लोग वापस बस स्टोप के लिये निकल गये। अब हमें वापस वो चढाई पार करनी थी। अमूमन क्या होता है हम जब कही पहली बार जाते हैं तो हमें रास्ते का इतना पता नही लगता है। और हम खुसी खुसी में रास्ता पार कर जाते है। अब हमें उस रास्ते की पहचान हो गयी थी। इसलिये उपर चढना काफी मुस्किल लग रहा था। और हमने खाना भी नही खाया था। उठते बैठते हम बस तक पहुचे और वापस घर के लिये रवाना हो गये। मैं रास्ते भर सोचता हुआ जा रहा था। कि इतने सारे लोग इतना भीड भडाका ....... शाम को घर पहुचने के बाद मैने दवा मां को खिलाई और अगले दिन रोज की तरह मै स्कूल गया। स्कूल हरएक की जुबान पर यही चर्चा थी। लोगों के मुह से सुनने में आया की किसी गांव में एक बुजुर्ग दमा रोग से पीडित था वह यह दवा खा के ठीक हो गया। मगर मैने एक बात नोट की कि सब लोग दूसरे गांव के बारे में बोल रहे हें मगर अपने गांव का हाल कोई नही बता रहा है। दुसरे दिन सुनने में आया कि वो दवा रोगी को तीन बार खिलानी पडती है तबभी जाके वो दवा असर करती है। मैने सोचा सायद मेरी मां को तभी आराम नही पहुच रहा। ये बात में अपने गांव वालो को बताता उन्हें इस बात की खबर पहले से थी। अगले दिन हम फिर दवा लेने पहुचे इस बार और ज्यादा भीड थी। अब हमारी बारी थी तीसरी आखंरी बार दवा लाने की। इस बार हम घर से ही खाना बना के ले गये थे। हम और दिन की तरह इस बार भी गाडी का इन्तजार कर रहे थे। इस बार हमें जीप मिली और हम लोग जीप में सफर कर रहे थे। हम अपने बस स्टेंड से करीब 1.2 की0मी0 दूर पहुचे ही होंगे कि हमारी जीप खराब हो गई वंहा से हमें पैदल का रास्ता तय करना था। क्योंकि उस आधे रास्ते से हमें कोई भी गाडी नही मिलने वाली थी।उस जीप मे हम लगभग 16लोग थे। हमने पैदल मार्च सुरु किया। दोपहर के 3 बजे लगभग उस गांव के समीप पहुचे इस बार वहां का नजारा देखने लायक था। वो जीर्ण रास्ता अब लोगों के चलने से अछा बन गया रास्तों के किनारों पर छोटी छोटी दुकाने खुल गयी। कहीं पर पूडी छोले तो कहीं पर फल वाला और कहीं पर छोटा सा ढाबा, अब वहां पर ये सुविधांये हो गयी। हम तो अपना खाना ले गये थे। अब हम दवा लेने के लोये नीचे की तरफ अतरने लगे। आसमान में बादल छाए हुये थे। बारिश कभी भी हो सकती थी ईसी वजह से सारे लोग तेजी से चले जा रहे थे। हम कुछ दूर नीचे की तरफ उतरे ही थे कि अचानक बारिश की बुंदे गिरने लगी। उतार वाले रास्ते में काफी मिट्टी होने की वजह से रास्ता काफी फिसलन सा हो गया था। खैर हम बचते बचाते आगे बढे। बारिश का मिजाज बढने लगा। लोगों की गति भी तेज होने लगी। हमारे आगे एक करीब 20 लोगों की टोली जा रही थी। अचानक एक महिला का पैर फिसल गया। उसके हाथ में एक थैला था। जिसमें एक अगरबत्ती का पाकेट और कुछ फूल थे। वो महिला जमीन से रघड खाती हुई इतनी दूर तक गयी की मानो वो फिसलपट्टी पर बैठी हो़। फिसलन काफी बढ गई थी। हम भी सोचसमझकर ही कदम रख रहे थे। इस बार लाईन पहले से और बडी थी। अब हम भी लाईन में लग चुके थे। उस घर के अगल बगल जो भी खेत थे उनमें घास का एक तिनका तक न था। इतने लोगों चलने से घास और बोई हुई फसल सब नस्ट हो गई थी। मैं जब उस घर के समीप पहुंचा तो भीड में हल्का सा धक्का लगा। मेरे हाथ में जो रोटी का थैला था वो जमीन में गिर गया। वो थैला लोगों के पैरों के तले कुचलने लगा। काफी मसक्कत के बाद उस थैले को उठा पाया। दवा लेने के बाद जब हम एकत्र हुये। तो हमने खाना खाने का फैसला किया हम एक बडे पत्थर पर बैठ गये। सबने अपना-अपना खाना निकाला मैने भी निकाला। अपनी रोटी सब्जी को देखदर में दंग रह गया। रोटी-सब्जी का हाल कुछ इस तरह था। सब्जी- आलू कि सब्जी को देखकर एसा लग रहा था कि जैसे किसी मशाले का पेस्ट बनाया होगा। और् रोटी-रोटी को देखकर एसा लग रहा था। जैसे गूंदा हुआ आटा रखा होगा। खैर मैने साथियों के साथ मिलकर उनका खाना खाया। और घर के लिये रवाना हो गये। घर पहुचने के बाद वो दवा मां को खिला दी। मैं आज तक इन्तजार करता रहा। मगर उस दवा से कोइ फायदा नही हुआ। हमने बेकार में समय बरबाद किया। इसीलिये कहते हैं कि अधंविस्वास में नही रहना चाहिये। जहां तक मैने सर्वे किया उस दवा से कोइ भी ठीक नही हूआ। ईसीलिये किसी ने ठीक ही कहा है कि "सोचो समझो फिर करो"
very niceeeeeeeeeee
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