पत्थर के आँसू
जब हवा में कुछ मंथर गति आ जाती है वह कुछ ठंडी हो चलती है तो उस ठंडी–ठंडी हवा में बिना दाएँ–बाएँ देखे चहचहाते पक्षी उत्साहपूर्वक अपने बसेरे की ओर उड़ान भरते हैं। और जब किसी क्षुद्र नदी के किनारे के खेतों में धूल उड़ाते हुए पशु मस्तानी चाल से घँटी बजाते अपने घरों की ओर लौट पड़ते हैं उस समय बग़ल में फ़ाइलों का पुलिन्दा दबाए, हाथ में सब्जी. का थैला लिए, लड़खड़ाते क़दमों के सहारे, अपने झुके कंधों पर दुखते हुए सिर को जैसे–तैसे लादे एक व्यक्ति तंग बाज़ारों में से घर की ओर जा रहा होता है। 'अरे एक बात तो भूल ही गई,’ क़लम ने फिर कहा। ‘उन्होंने पत्र के अंत में हम सब को भी याद किया था।' 'अरे कैसे?' सब ने आश्चर्य से पूछा। ‘उन्होंने लिखा कि काश मैं पेपरवेट होता, मेज़–कुर्सी की तरह फ़र्नीचर होता तो आज यह दिन न देखना पड़ता। चाहें जो होता पर मैं इनसान न होता।’ ‘ओह, तभी तो मुझे उठा कर अपने गालों से सहला रहे थे।’ पत्थर के पेपरवेट की ठस्स आवाज़ गीली हो उठी, उसके आँसू झिलमिला उठे। अधपकी झब्बेदार बेतरतीब मूँछें, चेहरे पर कुछ रेखाएँ–जिन की गहराइयों में न जाने कितने अरमान, आशाएँ और ...