
मैंने जैसलमेर को नक्से में देखा था वहां जाने को काफी उत्सुक था .बात २५ मई सन
२००६ की है.मुझे जैसलमेर एक परीछा देने जाना था. में शाम ३.०० बजे पुरानी दिल्ली
रेलवे स्टेशन पंहुचा ट्रेन छूटने का समय ३.२५ बजे था. मगर वो आधा घंटा मुझे दिन के
बराबर लग रहा था. में कभी इधर घूमता तो कभी उधर मन में शांति नहीं थी. जैसे ही ३.०५
मिनिट हुए धीरे धीरे भीड़ बदने लगी में भी उस भीड़ में शामिल हो गया जितने भी
हमउम्र आते एक बोर्ड की तरफ भागते में भी उनके पीछे -पीछे चला गया वो लोग उस बोर्ड
में अपना रेजेर्वेशन नंबर चैक कर रहे थे. में भी किशी तरह बोर्ड के नजदीक पंहुचा
अपना बुग्गी नंबर देखने लगा. काफी भीड़ थी सर ही सर देख रहे थे . अचानक मुझे पीछे
से धक्का लगा मेरे हाथ में पानी की बोतल और चिप्स का पाकेट था . वो निचे गिर गया और
लोगो के पैरो के निचे कुचलने लगा. इतने में धीरे से एक आवाज आई सोरी मैंने भीड़ के
बीच से अपने सर ऊपर उठा के पीछे की तरफ देखने की कोशिस की. एक हलकी सहमी व् थोडी
डरी सी इक लड़की दिखी, उसने हलके से होटों से कुछ बोला, एसा लग रहा था मानो वो कान
पकड़ के माफ़ी मांग रही हो. मैंने भी अपनी पलकों को झुकाते, हलकी से गर्दन हिलाते हुए
इशारा किया की मैंने उसे माफ़ कर दिया. खेर मैंने अपनी सीट नंबर देख कर बुग्गी के
अन्दर चला गया और सीट नंबर ६६ चेक करने लगा. चेक करते हुए में आगे बढ रहा था की सीट
नंबर ७० में मुझे वोही लड़की मिली. में उसके सामने खडा था. मैंने अपनी टिकिट की तरफ
इशारा करते हुए बोला सीट नंबर ६६ कहा मिलेगी वो धीमे से हसीं, आँखों से इशारा करते
हुए बोले आप अपने सीट पर ही है . मुझे थोडा सा ग्लानी से महसूस हुई, में थोडा सा
मुस्करा कर बोला ओ!ह ह ह ह …. सुक्रया कह कर बैठ गया . कोई बात नहीं, उसने कहा और
खिड़की से बहार की तरफ झाकने लगी. कुछ देर तक चुप बैठने के बाद.. मेने धीरे से बोला
आप मेरा बैग देखोगी में बहार से पानी ले के आता हूँ . उसने मेरी तरफ देखा. बोली आप
बैठे रहो में यहीं से मगवां दूंगी ..इतना कह कर उसने बहार की तरफ आवाज लगे भैया
पानी की बोतल देना….. इतना कहने के बाद उसने दो बोतल पानी खिड़की से अन्दर की तरफ
खींचे और एक बोतल मुझे दी मैंने थैंक्स कह कर उसे १०-१० के दो नोट दिए. मगर उसने
नहीं लिया मैंने कहा नहीं-नहीं एसा नहीं होता पैसे पकडो उसने मेरे हाथ को मेरे तरफ
धकेलते हुए कहा..आप ये पैसे वापस रखो क्योंकि वहां पर मेरी वजह से आपकी बोतल नीचे
गिर गई थे इसीलिए ….आप ..प्लीस… न…नहीं.. यह कहते हुए उसने मेरे हाथ को मेरे तरफ
धक्का माराते हुए मुझे पैसे वापस रखने को कहा मैंने भी इज्जित के खातिर वापस रख लिए
. तभी जोर से हार्न बजने की आवाज आई और हल्का झटका सा लगा और ट्रेन चल पड़ी. हलकी
-हलकी हिलकोरे लगाती हुई ट्रेन आगे बड़ने लगी | थोडी देर चुप बैठने के बाद मैंने
नर्म भाव से पुछा आप कहाँ तक जा रही हो . उसने हलकी सी आँखों को मेरी तरफ घुमाया और
सरारत भरी आवाज में बोली . जहाँ तक ट्रेन जायेगी वही तक जायेंगे . मैंने २ मिनिट के
लिए सोचा …. बोला प्लीस… मजाक मत करो वो बोली इस ट्रेन में ज्यादा से ज्यादा लोग
मेरे हिसाब से वही तक जा रहे है . तब मेरी समझ में आया की ये सरे लोग परीछा देने जा
रहें है . हमारा सफ़र जारी था कभी हम बात करते कभी हम चुप बैठ कर बहार का नजारा
देखते धीरे धीरे रात होने को आई . सूरज सोने की थाली की तरह दिख रहा था मानो वह छिन
जाने की दर से भाग रहा हो . ट्रेन और सूरज को देख कर एसा लग रहा था जैसे कोई सुन्दर
सोने से लदी राजकुमारी के पीछे कोई लुटेरा लग गया हो. धेरे-धेरे सूरज डूब गया.
डूबते समय एसा लग रहा था जैसे कह रहा हो अभी चलता हूँ मगर जल्दी ही मुलाकात होगी.
पर एसा मुझे ही लग रहा था या ……… खेर रात हो गयी. मैंने उसकी तरफ देखा तो वह किताब
पड़ रही थी .अगल बगल सीट वाले लोग इतना बोल रहे थे की.. मैंने उससे कहा आपके पास
कोई और किताब हो तो…… उसने कहा नहीं बस एक ही है चलो कोई बात नहीं इसे आप पड़ लो
मैं बाद में पड़ लुंगी मैंने कहा नहीं एसी कोई बात नहीं है में तो टाइम पास के लिए
मांग रहा था पर …………. वो धीरे से मुस्कुराई और बोली में भी बंद कर देती हूँ . फिर
हम बतों में लग गए. रात के करीब ९.०० बजे थे. मैंने हलकी सी अंगडाई और हलकी जमायीं
लेते हुए कहा अगर आप बुरा न मानो तो एक बात पूछूँ, मुसकुरा कर बोली पुछो मैंने कहा
आपका नाम क्या है वो बोली रवीना शुक्ला मैंने कहा बहुत अच्छा और मेरा नाम ..इतने
में वो बोली केशव में चोंक गया मैंने कहा आपको कैसे पता ….. वो मुस्कराई और बोली जब
स्टेशन पर बोर्ड में मै अपनी बुग्गी नंबर चैक कर रही थी तब मेरे नाम के ठीक नीचे
आपका नाम था. मैंने हलके से सर ऊपर उठाकर ….ओ!हह . हमारी काफी देर तक बात चीत चलती
रही, मैंने एक चीज नोटिस किया की वो अपने बालो को बार-बार सहलाती रहती थी.वो मुझे
सबसे अच्छा लागा. उसके बाद खाना खाया एक दुसरे को सुभ रात्री कह कर सो गये . कहाँ
आती ट्रेन में इतने लोग सफ़र कर रहे थे अलग - अलग किस्म के लोग थे सब आपस में बातें
कर रहे थे| मगर एक बात नोट करने वाली थी , किसी को परीछा की कोई चिंता नहीं थी बस
लोगों के मन एक ही उत्सुकता थी की वो जैसलमेर जा रहे हैं और वहां जाकर किला देखना
है | मै सोया तो था मगर नींद नहीं आई थी. मैंने अपने मुह पर तौलिया रखा था ताकि
बल्ब की रोशनी सीधे मेरे मुह पर न पड़े | बस लोगों की बाते सुन रहा था. कुछ देर बात
मैंने अपने मुह से तौलिये को थोडा सा ऊपर उठा के ये देखने की कोसीस की कि रवीना सो
रही है या जगी हुई है . रवीना ने करवट लिया हुआ था और हाथ में किताब लिए पढ़ रही थी,
मैंने एक लम्बी साँस ली और करवट उनकी तरफ करके उन्हें देखने लगा. काफी देर के बाद
उसने अपनी आँखों कि पुतली को मेरे तरफ फेरते हुए मुझे देखने कि कोसिस कि फिर वापस
अपनी किताब पड़ने लगी. मैं उससे बात करना चाहता था मगर एकदम हिम्मत नहीं बना पाया |
मेरा मन मुझे बार-बार उत्साहित कर रहा था मगर मैं अचानक फिर रुक जाता | वैसें तो
ट्रेन में बहुत लोग थे मगर मेरी सुई उसी पर अटकी हुई थी. मेरा मन चाहता था कि वो
मुझसे बात करे | अब रात काफी हो चुकी थी यात्रियों कि आवाज भी कुछ कम होने लगी थी
ट्रेन अपनी मस्ती में चल रही थी खिड़की के किनारों से हलकी सी हवा अन्दर आ रही थोडा
ठण्ड भी लग रही थी मैंने अपने तौलिये को अपने सरीर पर फैलाया आखों में हल्का सा नीद
का नासा सा छा रहा था मगर मैं आखों को जोर-जोर से खोल रहा था ताकि नीद मुझे अपनी
आगोस में ना लेले | ट्रेन कि हलकी हिलकोरे से यैसे प्रतीत हो रहा था मानो पालने में
बच्चे को सुला कर उसके झूले को झुला रहे हो | रवीना कि पढाई जारी थी मैंने पूछा
परीक्षा कि तयारी कर रही हो उसने बोला “बस यूँ ही थोडा……. मैंने यूँ ही थोडा सर उठा
कर बहार कि तरफ देखा बहार कुछ ख़ास नहीं था रात्री ने धरती को अपने अन्धकार में
समेटा हुआ था वो उठी और बाथरूम कि तरफ गयी में उठ कर अपनी सीट पर बैठ गया कुछ देर
बाद वो वापस हलकी ठिठुराहट के साथ वापस आईं मैंने पूछा क्या हुआ उसने कहा कुछ नहीं
थोडा ठण्ड है मैंने हाँ …कहते हुए बोला आपकी पढाई पूरी हो गयी . उसने कहा हाँ वो तो
बस …यूँ ही …अब में उसको थोडा बतों में लगाना चाहता था | फिर हम एसे ही सामान्य
बातें करने लगे मैंने उसको अगले दिन के प्रोग्राम के बारे में पूछा उसने कहा समय कि
ऊपर निर्भर करता है हम किस समय वहां पर पहुँचते है | मैंने कहा ठीक है हम बातें कर
रहे थे मेरी आखें बार-बार उसकी तरफ अपनेआप देखने लगती इसमें मेरा कोई दोस नहीं था |
वेसे दोस्तों आप सभी लोग ये जानते हो कि हर इन्शान कि आँखे होती है और हर आँख कि
अपनी एक खूबसूरती होती है मगर मुझे उसकी आँखों में अलग ही खूबसूरती नजर आती थी वो
सुन्दर आखें जैसे सुबह - सुबह ओस कि बूंद में सूरज कि पहली किरण पड़ रही हो , अगर
मैं अपने नजरिये से कहू तो उसकी आँखे देखने वाले को अपनी तरफ खींचती थी. सायद कुदरत
ये करिश्मा हर किसी को नहीं देता है मगर उसको इस बात का बिलकुल घमंड नहीं था वो
बिलकुल सीधी साधी थी | मेरा मानना है अगर कोई कविकार उसके सामने होता तो सायद वो
उसके बारे में कितनी कवितायेँ लिख देता . खेर … सुकर है चुतुर्भुज (भगवान् ) का कि
हम उससे मिले हमारी बात जारी थी बतों-बतों मै हमें कब नींद आ गयी पता ही नहीं चला
और जब आँख खुली तो हल्का हल्का सा उजाला मानो अँधेरे और उजाले में भयानक जंग छिड़ी
और अँधेरा परस्त हो गया हो और रणभूमि से भाग रहा हो| मैं उठा और भगवान् को याद करते
हुए अंगड़ाई ली फिर बाथरूम चला गया फ्रस होके वापस आया . धीरे धीरे सरे लोग जाग गए .
हमने गरम गरम चाय कि चुस्की के साथ अपने बाते फिर सुरु कर दी अब पुरे रेगिस्तान में
सूरज कि किरण फ़ैल गयी थी ट्रेन अपनी मस्तानी चाल में चल रही थी रेत के महीन कण उड़
रहे थे और दूर तक जहाँ तक हमारी नजर पहुच रही थी वहां तक न ही घास थी न ही कोई पेड़
. काफी देर इन्तजार करने के बाद एक स्टेसन आया वो पोखरण था सायद आपको याद होगा जहाँ
पर परमाणु परिक्षण किया गया था. वहां पर ट्रेन काफी देर तक रुकी थी सारे यात्री उतर
कर कुछ दूर तक गए . हमने जब वहां कि रेतीली भूमि के कटाव को जब देखा तो एसा लगा
जैसे वहां पर सदियों पहले समुन्द्र रहा होगा जो अब रेगिस्तान में तब्दील हो गया.
हमारी ट्रेन का इंजन बदल दिया गया वहां से हमारा नए इंजन के साथ सफर सुरु हुआ | कुछ
घंटे का सफर तय करने के बाद हमें सीमा सुरक्षा बल के जवान दिखाई दिए कुछ कंधे में
बंधूक रखे घूम रहे थे और जमीन गड्ढे बना के उसके अन्दर बैठे हुए थे . सुरक्षा बल
काफी मात्रा में थे |हम सभी यात्री इस सफर का तहे दिल से आनंद ले रहे थे मैं और
मेरी दोस्त हम काफी खुस थे ये जगह हमारे लिए अनजान थी हमें पता नहीं था आगे क्या
होगा हम दोनों आपस में खुसिया सेयर कर रहे थे अब हम दोनों काफी बदल गए थे . हमें
आपस में बात करने में कोई झिझक नहीं थी अब हम इतने घुल मिल गए थे कि बात करते करते
मेरे हात में तली मारती. लेकिन जो भी था काफी मजे दार था कुछ एसी बातें भी है जिनको
में आपस में बाँट भी नहीं सकता| हम अपनी बातों में खोये हुए थे कि तभी दूर कंटीले
तार कि बाड़ नजर आई. उससे प्रतीत होता था कि उस पार कहीं आबादी होगी. उस समय दोपहर
के २.१५ मिनिट हुए थे वो तर बाड़ काफी दूर तक फैली हुई थी कुछ और आगे जाने के बाड़
ट्रेन ने एक लम्बा हार्न दिया सरे यात्री चौकन्ना हो गए ट्रेन कि रफ़्तार धीरे धीरे
धीमी हुई और कुछ क्षण बाद धक् से ट्रेन रुक गई . हम स्टेसन से बाहर आये . मैंने
दोनों हाथों को फैलाते हुए एक बड़ी सी अंगड़ाई ली और ऑटो बुक किया होटल कि तरफ चल
दिए . दोस्तों हमारा दिल आज भी सीसे कि तरह साफ है. उस लड़की को हमारे साथ सफर में
कहीं भी कोई परेसानी नहीं हुई ……… होटल में पहुचने के बाद से लेकर सफर ख़त्म होने
तक कि कहानी को में बयां नहीं कर सकता वो किले में घूमना , ऊंट कि सवारी …… कई सारी
मीठी यादें है जिनको में आज तक अपने दिल में लिए घूम रहा हूँ. ये यांदें ही मेरे
जीवन कि सबसे अनमोल याद है ……
स्वागत है आपके इस ब्लॉग का..WELCOME
ReplyDeleteAapne aapke sansmaran hamse saajha kiye...shukriya!
ReplyDeleteहिंदी ब्लाग लेखन के लिये स्वागत और बधाई । अन्य ब्लागों को भी पढ़ें और अपनी बहुमूल्य टिप्पणियां देने का कष्ट करें
ReplyDeletegreat
ReplyDeleteस्वागत है बधाई हो ब्लाग लेखन के लिए ..
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